सहारनपुर : कहते है कि इंसान में होंसला और जज्बा हो तो वो क्या कुछ नहीं कर सकता। “ये कहावत तो अपने सुनी ही होगी कि “जरा तबियत से पत्थर तो उछालो यारो आसमान में भी सुराग हो जाये” कुछ ऐसा ही कर रहे है सहारनपुर के शाहआलम। जो ऐसे कारनामे को मुक्क्मल कर रहा है जिसकी आप कल्पना भी नहीं कर सकते। जी हां दिव्यांगता को अभिशाप मानने वालो के लिए सहारनपुर के शाहआलम एक ऐसी जिन्दा मिशाल बने हुए जिन्होंने अपनी दिव्यांगता को ही अपनी ताकत बना लिया। दोनों पैर और एक हाथ बचपन में पोलियो ग्रस्त हो गए।

शाहआलम ने दिव्यांगता को अपनी ताकत बनाकर चित्र कला के क्षेत्र में जो मुकाम हासिल किया है यह न सिर्फ अन्य दिव्यांगो के लिए मिशाल बना है बल्कि सामान्य लोगो के लिए भी एक सीख देता है। इस दिव्यांग की कला को देखकर लगता है कि शाहआलम के होंसलो की उड़ान कभी उनकी दिव्यांगता में आड़े नहीं आ सकती। ख़ास बात तो ये है कि शाह आलम को सही हाथ में भी पैरालिसिस हो गया। लेकिन शाह आलम का होंसला कम हुआ। अब शाहआलम मुंह से पेटिंग बनाकर हर किसी के लिए अनोखी मिशाल पेश कर रहे हैं।
आपको बता दें कि शाहआलम का जन्म महानगर सहारनपुर के एक मध्यम वर्गीय परिवार में हुआ था। जब शाहआलम एक साल के थे तब उसके दोनों पैरों और एक हाथ में पोलियो हो गया। शाहआलम बताते हैं कि उस वह एक जगह ही पड़े रहते थे। शरीर में सिवाय दिमाग और एक हाथ के कोई अंग काम नहीं करता था। हालत ये थे कि वह अपने ऊपर से मक्खिया भी नहीं उड़ा पाता थे। धीरे धीरे वक्त गुजरा तो उसकी माँ ने उसके आगे कॉपी और पेन्सिल रखने शुरू कर दिए ताकि एक हाथ से वह खेलते खेलते कुछ लिखना शुरू कर दे। उम्र बढ़ी तो उसने चित्र बनाने शुरू कर दिए। यह सब देख उसकी माँ ने उसका उत्साह बढ़ाया और और बेहतर करने के लिए प्रेरित किया। जैसे जैसे उम्र बढ़ी तो शाहआलम दोनों पैर और एक हाथ ना होने के बावजूद एक अच्छी चित्रकारी करने लगा।
शाह आलम बताते हैं कि एक जगह पड़े पड़े वह टीवी पर दर्शन देखता रहता था। एक दिन उसने मर्द फिल्म का सीन देखा जिसमें अमिताभ बच्चन की माँ को शेरावाली का शेर गुंडों से बचाकर ले जाता है। इस दृश्य को उसने पहली बार अपनी पेटिंग के जरिये दर्शाया था जिसकी सबने खूब सराहना की थी। इसके बाद उसने देख भक्ति से प्रेरित पेंटिग बनाना शुरू किया। क्योंकि उसके दादा और परदादा ने आजादी की लड़ाई में भूमिका निभाई थी। करीब 17 सालों से शाहआलम ने हजारों पेटिंग बनाई और विभिन्न प्रदर्शनियों में हिस्सा लिया। जहां कई बार शाहआलम की पेटिंग को प्रथम पुरूस्कार मिला। कई समाजिक संस्थाओं ने उसको पुरुस्कृत कर सम्मानित भी किया। प्रदर्शनियों में शाहआलम की पेटिंग की बिक्री भी हुई लेकिन वाजिब कीमत नहीं मिली पाई। शायद यही वजह है कि अन्य दिव्यांगों के लिए पेटिंग्स स्कूल खोलने का सपना साकार होना तो दूर आर्थिक स्तिथि भी मजबूत नहीं हो पाई। शाहआलम के मुताबिक़ उसकी एक पेटिंग ही सबसे कीमती रही जिसके उसको 12000 रूपये मिले थे।

शाहआलम बताते है कि कोरोना काल में उसके स्वस्थ हाथ में पैरालिसिस हो गया। जिसके बाद वे पूरी तरह दिव्यांग हो गए। अब वे बिस्तर से उठने में भी असमर्थ है लेकिन होंसला कम नहीं हुआ। उन्होंने बताया कि चित्रकारी उसके लिए भगवान का दिया हुआ वरदान है। जिसको वह छोड़ नहीं सकता। दोनों हाथ पैरों से लाचार होने के बावजूद उसने मुहं से पेटिंग बनाना शुरू कर दिया। शाहआलम मुँह में ब्रूस लेकर चंद मिनटों में कोई भी चित्र बना देते हैं। लेकिन उनकी पेटिंग की वाजिब कीमत नहीं मिल पाना उसके लिए चिंता का विषय बना हुआ है। चित्रकारी ही उसके पालन पोषण एक मात्र सहारा है। शाहआलम के अनुसार कई जगहों से उसको सम्मानित करने के ऑफर आये लेकिन ऐसी हालत में घर बाहर जाना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है। कई संथाओं ने ऑनलाइन सम्मानित सर्टिफिकेट भेजे तो कई संस्थाओं ने बुलावा भी भेजा।
शाहआलम पैरालिसिस से पहले अपनी पेटिंग्स लेकर लखनऊ, दिल्ली प्रगति मैदान, देहरादून समेत कई प्रदर्शनियों में गए। जहां उसकी दिव्यांगता को देखते हए सुंदर पेटिंग्स की खूब सराहना हुई। लेकिन घर की माली हालत में कोई सुधार नहीं हुआ। बूढी माँ ने सहारे के लिए एक मूकबधिर लड़की के साथ निकाह कर दिया। जिससे उसको सहारा तो मिल गया लेकिन जिम्मेदारी के साथ एक बोझ भी बढ़ गया। लिख कर दें तो मूकबधिर पत्नी पेटिंग सबंधी सामान लाने में मदद कर देती है। दोनों पति पत्नी एक कमरे में अपना जीवन बसर कर रहे हैं। कोई पेटिंग बिक जाती है तो घर में राशन आ जाता है। पडोसी जावेद ने बताया कि शाहआलम हाथों और पैरों से भले मोहताज़ हो लेकिन भगवान् से उसको पेटिंग बनाने का ऐसा हुनर दिया है जिसकी एक स्वस्थ व्यक्ति कल्पना भी नहीं कर सकता। लेकिन बीमारी और आर्थिक तंगी ने शाहआलम को कमजोर कर दिया।

वहीं पेटिंग खरीददार अशलम खान ने बताया कि शाहआलम की बनाई पेटिंग्स हर किसी को अपनी ओर आकर्षित करती है। उसने देश भक्ति को प्रेरित करने वाली कई पेटिंग्स खरीदी है जो उनके घर की शोभा बढ़ा रही है। अपनी पेटिंग के जो दाम उसने मांगे वो उसको दे दिए। लेकिन जब से पैरालिसिस हुआ है तब से वह बाहर नहीं जा पा रहा। जिससे उसकी पेटिंग बिकना कम हो गई हैं। लेकिन उसका होंसला बदस्तूर जारी है। अब यहां यह कहना भी गलत नहीं होगा कि “क्यों ढूंढते हो तक़दीर हाथो की लकीरो में नशीब तो उनका भी होता है जिनके हाथ नहीं होते” एक हाथ और दोनों पैरो से अपाहिज शाहआलम पर सही बैठती हैं। बचपन की बीमारी के कारण अपने दोनों पैरो को गँवा बैठे शाहआलम अपने हुनर और क़ाबलियत के बल पर दिव्यांगों के भीतर एक नया जोश भरने की मुहीम चला रहे है।
शाहआलम ने दिव्यांगता को अपनी ताकत बनाकर चित्र कला के क्षेत्र में जो मुकाम हासिल किया है यह न सिर्फ अन्य दिव्यांगो के लिए मिशाल बना है बल्कि सामान्य लोगो के लिए भी एक सीख देता है। इस दिव्यांग की कला को देखकर लगता है कि शाहआलम के होंसलो की उड़ान कभी उनकी विकलांगता के आड़े नहीं आ सकती। दोनों पैरो से मजबूर शाहआलम चित्रकारी की दुनिया में दिव्यांग लोगो का होसंला बनकर उभर रहे है। मशहूर चित्रकार मकबूल फ़िदा हुसैन को अपना आदर्श मानने वाले शाहआलम की सुन्दर चित्रकला को देखकर हर कोई उनके इस हुनर का कायल है। Saharanpur News

